Thursday, July 31, 2008

जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई------------(वो कौन थी)

2 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

वकील साहब जी कृप्‍या ये बता दें कि इतने अच्‍छे अच्‍छे पुराने नग्‍में पेश करने का आइडिया आता कहां से आपके दिमाग में बहुत ही बढिया पेशकश और हां हो सके तो एक मेरी फरमाईश हे अगर पूरी हो सके तो काफी दिनों से बेचैन हूं गाना है


मेरे बाग की चिडिया सुन
मेरी भोली बिटिया सुन
करमगति ना ही टरे
बहुत ही पुरानी फिल्‍म का गाना है सबको बहुत ही पसंद भी आएगा खासतौर पर पिता और बेटी के तो दिल को छू जाएगा

राज भाटिय़ा said...

अजी दास्तन इस तरह से सुनाओगे तो रोना तो आये गा ही ना,
मेरी पंसद का एक ओर गीत धन्यवाद